जातिय संघर्ष की ओर : भारत

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प्राचीन वैदिक समाज को श्रम विभाजन तथा सामाजिक जिम्मेदारियों के तहत चार वर्णों में विभाजित किया गया था। कालांतर में इनसे लाखों जातियां बन गईं। प्राचीन वर्ण व्यवस्था का सही या गलत होना हमेशा से विवादित रहा है, परंतु इसमे कोई शक नही है कि पिछले कुछ सौ वर्षों से जातिगत व्यवस्था के नकारात्मक परिणामों को इस समाज ने देखा और महसूस किया और इस प्रकार जातिगत व्यवस्था के खिलाफ लोगों के मन मे दृढ़ता बढ़ती गई। आज़ादी के बाद संविधान निर्माण के समय जातिगत व्यवस्था को मिटाने के प्रयास किये गए जिसके तहत अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन का प्रावधान किया गया। कुल मिलाकर एक लोकतांत्रिक देश को संवैधानिक तरीके से जातिगत व्यवस्था से दूर करने की कोशिश आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व की गई थी। अब कई पीढ़ियों बाद भी समाज मे जातिगत व्यवस्था की स्थिति बहुत ही निराशाजनक तथा दुःखद है और देश के ज्यादातर हिस्सों में ख़ूनी जातिगत टकराव की स्थिति हमे देखने को मिलती रही है। कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद में पटेल जाति के आठ-दस घरों को ब्राह्मण जाति के लोगों ने जला दिया था और महिलाओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं भी देखने को मिली। यही नहीं जौनपुर जनपद के बदलापुर के एक गांव में ब्राह्मणों ने राधेश्याम यादव की हत्या कर दी और चार लोगों को गम्भीर रूप से घायल कर दिया।
एक सभ्य समाज से होने का दावा करने के नाते हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि आखिर 70 साल बाद भी जातिगत व्यवस्था इस समाज को इतनी बुरी तरह से क्यों जकड़ी हुई है; जबकि एक लोकतंत्र होने के नाते हर समय हम किसी भी योजना को जाति, धर्म तथा सम्प्रदाय से ऊपर उठकर क्रियान्यवित करने का दावा करते हैं। सवाल ये भी है कि क्या ये टकराव सिर्फ कानून व्यवस्था का मसला हैं या वाक़ई जातिवाद का घिनौना ज़हर हमारे समाज मे फैला हुआ है? विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा तमाम आरोप प्रत्यारोप कर उसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए भले ही इन टकरावों को कानून व्यवस्था का मुद्दा बताया जाता हो परन्तु इनके लंबे इतिहास को देखते हुए ये कानून व्यवस्था का मुदा नही लगता है बल्कि ये घटनाएं समाज मे एक दूसरे के प्रति फ़ैली नकारात्मकता तथा नफरत की भावना है जो समय समय पर तमाम जातिगत संघर्षों के रूप में सामने आती रहती है।
इसकी मूल वजह पर अब हमें गंभीरता से विचार करना होगा कि क्यों आखिर नई पीढ़िया भी जातिगत नफरतों से दूर नही रह पा रही हैं। हमे यह समझने की जरूरत है कि वर्तमान व्यवस्था के तहत जातिवाद मिटा पाना असंभव है और अगर जातिवाद का जहर इस देश से मिटाना है तो जाति आधारित हर व्यवस्था को खत्म करना होगा और हर व्यक्ति को ये बताने के लिए मजबूर नही करना होगा कि वो किस जाति या धर्म से संबंधित है। सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाने के ढेरों विकल्पों में से किसी और को चुनना होगा।

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